भगवद्गीता जीवन के परम उद्देश्य के बारे में क्या कहती है? आत्मज्ञान, स्वधर्म, मोक्ष और ईश्वर प्राप्ति — सम्पूर्ण मार्गदर्शन हिन्दी में।
गीता के अनुसार जीवन का परम उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करना और मोक्ष पाना है — अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना। इसके लिए तीन मार्ग हैं — निष्काम कर्म (कर्मयोग), ईश्वरीय भक्ति (भक्तियोग) और आत्मविवेक (ज्ञानयोग)। सबसे पहले अपने स्वधर्म को पहचानें और उसका पालन करें।
भगवद्गीता की शुरुआत ही जीवन के सबसे बड़े प्रश्न से होती है — "मुझे क्या करना चाहिए?" अर्जुन कुरुक्षेत्र में खड़े होकर अपने कर्तव्य और नैतिकता के बीच फँसे हैं। यही प्रश्न हम सब के जीवन में भी आता है — हमारा जीवन किसलिए है? हम क्यों यहाँ हैं? हमें क्या करना चाहिए?
श्रीकृष्ण का उत्तर बहुआयामी है। वे कहते हैं कि जीवन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं है, बल्कि आत्मा की उन्नति करना है। गीता 2.13 में वे बताते हैं कि जिस प्रकार शरीर बालपन, यौवन और वृद्धावस्था से गुज़रता है, उसी प्रकार आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है। जीवन का वास्तविक उद्देश्य इस शाश्वत आत्मा को पहचानना है।
भारतीय दर्शन में जीवन के चार उद्देश्य (पुरुषार्थ) बताए गए हैं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। गीता इन चारों को एक व्यवस्थित ढाँचे में प्रस्तुत करती है:
गीता के अनुसार जीवन का पहला उद्देश्य अपने धर्म (कर्तव्य) का पालन करना है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते" (2.31) — अपने क्षत्रिय धर्म को देखते हुए भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए। स्वधर्म का पालन ही जीवन की नींव है।
गीता दूसरे अध्याय में आत्मा के स्वरूप का गहन वर्णन करती है। "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः" (2.23) — आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती। जब मनुष्य अपने इस शाश्वत स्वरूप को पहचान लेता है, तब भय, शोक और मोह समाप्त हो जाते हैं। यही आत्मज्ञान जीवन का केन्द्रीय उद्देश्य है।
गीता केवल व्यक्तिगत मोक्ष की बात नहीं करती, बल्कि लोककल्याण (लोकसंग्रह) को भी जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य बताती है। गीता 3.20 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि राजा जनक जैसे लोगों ने लोकसंग्रह के लिए कर्म किया। जब हम दूसरों की सेवा बिना किसी अपेक्षा के करते हैं, तो यह स्वयं ईश्वर की पूजा बन जाती है।
गीता का अन्तिम और परम उद्देश्य मोक्ष है। अठारहवें अध्याय के अन्तिम श्लोकों में श्रीकृष्ण कहते हैं — "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (18.66) — सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। यह शरणागति ही मोक्ष का मार्ग है। मोक्ष का अर्थ है आत्मा का परमात्मा से मिलन, जन्म-मृत्यु के चक्र से सदा के लिए मुक्त होना।
गीता में "स्वधर्म" शब्द बार-बार आता है। यह आपकी प्रकृति, क्षमता और परिस्थिति के अनुसार आपका विशिष्ट कर्तव्य है। श्रीकृष्ण बार-बार कहते हैं कि दूसरों के धर्म की नकल करने से अपना धर्म त्रुटिपूर्ण होने पर भी श्रेष्ठ है (3.35, 18.47)।
अपना स्वधर्म खोजने के लिए ये प्रश्न पूछें:
गीता 18.45-46 में कृष्ण कहते हैं — "स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः" — प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कर्म में लगकर सिद्धि प्राप्त करता है। यही गीता का सन्देश है — बाहर मत खोजो, अपने भीतर देखो।
आज के युग में बहुत से लोग उद्देश्यहीनता से पीड़ित हैं — करियर का भ्रम, रिश्तों में असन्तोष, भौतिक सुख मिलने पर भी खालीपन। गीता इन सबका उत्तर देती है:
महात्मा गाँधी ने कहा — "गीता ने मुझे सिखाया कि जीवन का उद्देश्य सेवा है, और सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है।" जब हम अपने कर्म को सेवा में बदल देते हैं, तो जीवन स्वतः उद्देश्यपूर्ण हो जाता है।
गीता जीवन की प्रमुख चुनौतियों का समाधान इस प्रकार देती है:
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