गीता का सार — भगवद्गीता का सम्पूर्ण सारांश

श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्यायों और 700 श्लोकों का सम्पूर्ण सार सरल हिन्दी में। कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग की मूल शिक्षाएँ।

संक्षिप्त उत्तर

भगवद्गीता का सार है: निष्काम भाव से कर्म करो (2.47), सुख-दुःख में समान रहो (2.48), ईश्वर में अटूट भक्ति रखो (12.8), मन और इन्द्रियों को वश में करो (6.35), और अंत में सर्वस्व भगवान को समर्पित कर दो (18.66)। गीता चार मार्ग बताती है — कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग — जो सभी मोक्ष की ओर ले जाते हैं।

भगवद्गीता का परिचय और पृष्ठभूमि

श्रीमद्भगवद्गीता हिन्दू धर्म का सबसे पवित्र और प्रभावशाली ग्रंथ है। यह महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है और इसमें 18 अध्याय तथा 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर जब अर्जुन अपने बंधु-बांधवों, गुरुओं और प्रियजनों को शत्रु पक्ष में देखकर विषाद से भर गए और युद्ध करने से मना कर दिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें धर्म, कर्म, ज्ञान और मोक्ष का उपदेश दिया।

गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए है। इसकी शिक्षाएँ किसी एक धर्म, जाति या युग तक सीमित नहीं हैं। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था — "गीता सार्वभौमिक शास्त्र है जो प्रत्येक मनुष्य को उसकी समस्याओं का समाधान देता है।" महात्मा गाँधी ने गीता को "माता" कहा और जीवन भर इसकी शिक्षाओं का पालन किया।

धृतराष्ट्र उवाच — धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र ने कहा — हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

गीता के 18 अध्यायों का तीन खंडों में विभाजन

गीता के 18 अध्यायों को तीन प्रमुख खंडों में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक खंड में छह-छह अध्याय हैं जो क्रमशः कर्म, भक्ति और ज्ञान पर केन्द्रित हैं:

प्रथम खंड: कर्मयोग (अध्याय 1-6)

पहले छह अध्याय मुख्यतः कर्म और कर्मयोग पर केन्द्रित हैं। पहले अध्याय में अर्जुन का विषाद, दूसरे में आत्मा का अमरत्व और निष्काम कर्म, तीसरे में कर्मयोग की विधि, चौथे में ज्ञान-कर्म-संन्यास, पाँचवें में कर्म-संन्यास और छठे में ध्यानयोग का वर्णन है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्मफल में कभी नहीं। कर्मफल का हेतु मत बनो और अकर्म में भी आसक्ति मत रखो।

द्वितीय खंड: भक्तियोग (अध्याय 7-12)

मध्य के छह अध्याय भक्ति और ईश्वर के स्वरूप पर केन्द्रित हैं। सातवें अध्याय में ज्ञान-विज्ञान, आठवें में अक्षरब्रह्म, नवें में राजविद्या-राजगुह्य, दसवें में विभूतियोग, ग्यारहवें में विश्वरूपदर्शन और बारहवें में भक्तियोग का वर्णन है। ग्यारहवें अध्याय का विश्वरूपदर्शन गीता का सबसे विस्मयकारी प्रसंग है।

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
मुझमें ही मन लगाओ, मुझमें ही बुद्धि स्थिर करो। इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।

तृतीय खंड: ज्ञानयोग (अध्याय 13-18)

अंतिम छह अध्याय ज्ञान, प्रकृति-पुरुष विवेक और मोक्ष पर केन्द्रित हैं। तेरहवें अध्याय में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ, चौदहवें में गुणत्रय, पन्द्रहवें में पुरुषोत्तम, सोलहवें में दैवासुर सम्पत्ति, सत्रहवें में श्रद्धात्रय और अठारहवें अध्याय में मोक्षसंन्यास योग का वर्णन है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सभी धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

गीता की पाँच मूल शिक्षाएँ

1. निष्काम कर्म — फल की आसक्ति के बिना कर्म

गीता की सबसे प्रसिद्ध शिक्षा निष्काम कर्म है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करना चाहिए, लेकिन कर्मफल में आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। यह कर्म से भागना नहीं है — बल्कि कर्म में पूर्ण समर्पण है जबकि फल ईश्वर पर छोड़ देना है। आधुनिक जीवन में यह सिखाता है कि परीक्षा में पूरी मेहनत करो पर अंकों की चिन्ता छोड़ो, नौकरी में पूरी लगन दो पर प्रोमोशन की लालसा त्यागो।

2. समत्व — सुख-दुःख में समभाव

गीता 2.48 में श्रीकृष्ण कहते हैं — "योगस्थः कुरु कर्माणि" — अर्थात् योग में स्थिर होकर कर्म करो। सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखना ही योग है। सुख आने पर उन्मत्त नहीं होना और दुःख आने पर विचलित नहीं होना — यही स्थितप्रज्ञता है। दूसरे अध्याय (2.55-72) में स्थितप्रज्ञ के लक्षणों का सुन्दर वर्णन मिलता है।

3. भक्ति — ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम

बारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण भक्तियोग को सबसे सरल और प्रभावी मार्ग बताते हैं। वे कहते हैं — "जो सर्वकर्म मुझमें अर्पण करके, मुझमें परायण होकर, अनन्य भक्ति से मेरा ध्यान करता है, उसे मैं शीघ्र ही मृत्यु-सागर से उद्धार करता हूँ" (12.6-7)। भक्ति का अर्थ मन्दिर में पूजा मात्र नहीं — प्रत्येक कार्य को ईश्वरीय अर्पण बनाना ही सच्ची भक्ति है।

4. आत्मसंयम — मन पर नियंत्रण

छठे अध्याय में श्रीकृष्ण ध्यानयोग की विधि बताते हैं। अर्जुन कहता है कि मन बड़ा चञ्चल है और इसे वश में करना वायु को रोकने के समान कठिन है। इस पर श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं — "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" (6.35) — अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में किया जा सकता है। नियमित ध्यान, इन्द्रिय संयम और धैर्यपूर्ण साधना से मन स्थिर होता है।

5. शरणागति — सम्पूर्ण समर्पण

गीता का चरम श्लोक (18.66) शरणागति का उपदेश है — सब कुछ छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। यह निष्क्रियता नहीं है बल्कि परम विश्वास है। जब मनुष्य पूरा प्रयास करके, अपना कर्तव्य निभाकर, फिर भी फल को ईश्वर पर छोड़ देता है — यही शरणागति है। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य — तीनों ने इस श्लोक को गीता का सार माना है।

गीता के चार योग मार्ग

गीता चार प्रमुख योग मार्ग बताती है जो अलग-अलग स्वभाव के लोगों के लिए उपयुक्त हैं:

ये चारों मार्ग परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि ये सभी मार्ग अन्ततः एक ही लक्ष्य — मोक्ष — की ओर ले जाते हैं। व्यवहार में, अधिकांश साधक इन चारों मार्गों का मिश्रण अपनाते हैं।

आधुनिक जीवन में गीता का सार कैसे अपनाएँ

गीता की शिक्षाएँ पाँच हजार वर्ष पुरानी होकर भी आज के जीवन में पूर्णतः प्रासंगिक हैं:

  1. कार्यस्थल पर: अपने कार्य में सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें, पर प्रमोशन या पुरस्कार की चिन्ता न करें। कर्मयोग का यही सार है।
  2. परीक्षा और प्रतियोगिता में: तैयारी पूरी करें, पर परिणाम की चिन्ता छोड़ दें। यह 2.47 का व्यावहारिक अनुप्रयोग है।
  3. सम्बन्धों में: सबके प्रति समदृष्टि रखें (5.18)। बिना शर्त प्रेम करें, बदले में कुछ अपेक्षा न रखें।
  4. मानसिक स्वास्थ्य: दैनिक ध्यान का अभ्यास करें (6.10-15)। मन को शान्त और स्थिर रखने का यह सबसे प्रभावी उपाय है।
  5. कठिन समय में: विश्वास रखें कि सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हो रहा है। शरणागति (18.66) कठिन समय में सबसे बड़ा सहारा है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अपना धर्म गुणरहित होने पर भी दूसरे के अच्छे धर्म से श्रेष्ठ है। स्वधर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भयावह है।

गीता के प्रसिद्ध भाष्यकार

भगवद्गीता पर सबसे प्रसिद्ध भाष्य तीन आचार्यों ने लिखे हैं:

आधुनिक काल में स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी (अनासक्तियोग), लोकमान्य तिलक (गीतारहस्य), श्री अरविन्द (गीता प्रबन्ध) और स्वामी चिन्मयानन्द ने गीता पर महत्वपूर्ण भाष्य लिखे हैं।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता का सार क्या है?
भगवद्गीता का सार है — निष्काम कर्म करो, फल की चिंता मत करो, ईश्वर में श्रद्धा रखो, मन को वश में करो और अंत में भगवान को समर्पित हो जाओ। गीता ज्ञान, कर्म, भक्ति और ध्यान — इन चार योग मार्गों के माध्यम से मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देती है।
गीता में कुल कितने अध्याय और श्लोक हैं?
भगवद्गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इन 18 अध्यायों को तीन खंडों में बाँटा जा सकता है — कर्मयोग (अध्याय 1-6), भक्तियोग (अध्याय 7-12) और ज्ञानयोग (अध्याय 13-18)।
गीता का सबसे महत्वपूर्ण संदेश कौन सा है?
गीता का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है — "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" (2.47) — अर्थात तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्मफल में कभी नहीं। यह श्लोक निष्काम कर्म की मूल शिक्षा देता है।
गीता किसने किसको सुनाई थी?
भगवद्गीता भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि पर सुनाई थी। जब अर्जुन अपने बंधु-बांधवों को सामने देखकर युद्ध करने से मना कर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्तव्य और धर्म का ज्ञान दिया।
गीता पढ़ने की शुरुआत कहाँ से करें?
गीता पढ़ने की शुरुआत दूसरे अध्याय (सांख्य योग) से करें क्योंकि इसमें गीता की सभी मुख्य शिक्षाओं का सारांश है। फिर तीसरा अध्याय (कर्मयोग), बारहवाँ अध्याय (भक्तियोग) और अठारहवाँ अध्याय (मोक्षसंन्यास योग) पढ़ें।