मन को वश में कैसे करें — भगवद्गीता की शिक्षा

अभ्यास और वैराग्य, इन्द्रिय नियंत्रण, ध्यान और प्राणायाम — मन की चंचलता पर विजय के लिए श्रीकृष्ण के उपदेश

संक्षिप्त उत्तर

गीता 6.35 में श्रीकृष्ण कहते हैं — मन चंचल है, लेकिन अभ्यास (नियमित प्रयास) और वैराग्य (विषयों से विरक्ति) से वश में आता है। गीता 6.5 में कहा गया — "मन ही मनुष्य का मित्र है और मन ही शत्रु" — जो इसे जीतता है उसका मन मित्र बन जाता है, जो हारता है उसका मन शत्रु। ध्यान, प्राणायाम, संतुलित जीवनशैली और सात्विक आहार — ये मन पर विजय के व्यावहारिक उपाय हैं।

मन — मित्र या शत्रु?

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
— भगवद्गीता 6.5
जिसने अपने मन को जीत लिया, उसका मन उसका मित्र है। लेकिन जो मन को नहीं जीत सका, उसका मन शत्रु की तरह व्यवहार करता है।

यह गीता का अत्यंत गहन सिद्धांत है — सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, भीतर है। कुरुक्षेत्र का बाहरी युद्ध तो कुछ दिनों में समाप्त हो गया, लेकिन मन का युद्ध आजीवन चलता है। हम अपने सबसे बड़े शत्रु — अनियंत्रित मन — से प्रतिदिन लड़ते हैं।

अनियंत्रित मन क्या करता है?

गीता कहती है कि जीता हुआ मन सबसे बड़ा मित्र है — वह शांति देता है, सही निर्णय लेने में सहायता करता है, और जीवन के उद्देश्य की ओर ले जाता है।

मन की चंचलता — अर्जुन की समस्या, हमारी समस्या

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
— भगवद्गीता 6.34
हे कृष्ण! मन बड़ा चंचल, प्रमथन करने वाला, बलवान और हठी है। इसे वश में करना मुझे वायु को रोकने जैसा कठिन लगता है।

अर्जुन एक महान योद्धा था — उसने अनेक युद्ध जीते थे। लेकिन मन को वश में करने के बारे में वह स्वीकार करता है — "यह तो हवा को पकड़ने जैसा कठिन है!" यह ईमानदार स्वीकृति बताती है कि मन की चंचलता सबकी समस्या है — साधक की भी, गृहस्थ की भी।

अर्जुन मन की चार विशेषताएँ बताता है:

  1. चंचल (Restless) — एक विषय पर नहीं टिकता, बार-बार भटकता है
  2. प्रमाथि (Turbulent) — विचलित करने वाला, शांत नहीं रहने देता
  3. बलवत् (Powerful) — बुद्धि से भी अधिक बलशाली — जानते हुए भी गलत करवा लेता है
  4. दृढ (Obstinate) — हठी — एक बार जो विषय पकड़ लेता है, छोड़ता नहीं

आज के डिजिटल युग में मन की चंचलता और बढ़ गई है — सोशल मीडिया, notifications, information overload — ये सब मन को और अधिक अस्थिर बनाते हैं। गीता का समाधान 5000 वर्ष बाद भी उतना ही प्रासंगिक है।

श्रीकृष्ण का समाधान — अभ्यास और वैराग्य

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
— भगवद्गीता 6.35
हे महाबाहो! निस्संदेह मन चंचल और वश में करना कठिन है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।

श्रीकृष्ण पहले समस्या को स्वीकार करते हैं — "असंशयं... दुर्निग्रहम्" — निस्संदेह मन कठिन है। फिर समाधान देते हैं — दो शस्त्रों से मन पर विजय पाई जा सकती है:

1. अभ्यास (Practice) — नियमित, धैर्यपूर्ण प्रयास

"अभ्यास" का अर्थ है — बार-बार, निरंतर, धैर्य से प्रयास करना। मन को एकाग्र करने का प्रयास करो; वह भटकेगा — पुनः लाओ। यह प्रक्रिया सैकड़ों बार दोहराओ। पतंजलि के योगसूत्र (1.13-14) में भी कहा गया — "स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः" — अभ्यास दीर्घकाल तक, निरंतर, श्रद्धापूर्वक करने पर दृढ़ आधार बनता है।

व्यावहारिक अभ्यास:

2. वैराग्य (Detachment) — विषयों से मन की आसक्ति कम करना

"वैराग्य" का अर्थ संसार त्यागना नहीं है — यह विषयों पर मानसिक निर्भरता कम करना है। जब मन किसी वस्तु, व्यक्ति या परिणाम पर अत्यधिक निर्भर हो जाता है, तो वह अशांत हो जाता है।

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
— भगवद्गीता 2.62-63
विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से काम (इच्छा), काम से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से स्मृति भ्रम, स्मृति भ्रम से बुद्धि नाश और बुद्धि नाश से मनुष्य का पतन होता है।

यह गीता का "मन के पतन का सूत्र" है — विषय-चिंतन → आसक्ति → काम → क्रोध → मोह → स्मृतिभ्रम → बुद्धिनाश → पतन। इस श्रृंखला का प्रथम चरण "विषय-चिंतन" रोकना ही वैराग्य है।

व्यावहारिक वैराग्य:

इन्द्रिय नियंत्रण — कछुए का उदाहरण

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
— भगवद्गीता 2.58
जैसे कछुआ अपने सब अंगों को खोल में समेट लेता है, वैसे ही जब मनुष्य इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।

यह गीता का सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है। मन इन्द्रियों के माध्यम से बाहर भटकता है — आँखें आकर्षक वस्तु देखती हैं, कान प्रशंसा-निंदा सुनते हैं, जिह्वा स्वादिष्ट भोजन चाहती है। इन्द्रिय नियंत्रण का अर्थ है — आवश्यकता पड़ने पर इन्द्रियों को विषयों से वापस खींचने की क्षमता।

गीता 2.59 में एक महत्वपूर्ण सूक्ष्मता बताई गई — "रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते" — बलपूर्वक इन्द्रियों को रोकने पर भी विषयों का रस (स्वाद) बना रहता है। यह रस तभी समाप्त होता है जब व्यक्ति परम (ईश्वर) का दर्शन करता है। अर्थात इन्द्रियों को दबाने से नहीं, बल्कि उच्चतर आनंद की ओर मोड़ने से वे स्वतः नियंत्रित होती हैं।

व्यावहारिक उदाहरण: जो व्यक्ति ध्यान में आंतरिक शांति का अनुभव कर लेता है, उसे बाहरी मनोरंजन की आवश्यकता कम होती जाती है।

मन के तीन शत्रु — काम, क्रोध, लोभ

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
— भगवद्गीता 16.21
काम (वासना), क्रोध और लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को त्यागना चाहिए।

मन को वश में करने के लिए इन तीन शत्रुओं को पहचानना आवश्यक है:

1. काम (अनियंत्रित इच्छा)

गीता 3.37 में कृष्ण कहते हैं — "रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही सबसे बड़ा शत्रु है।" काम का अर्थ केवल यौन वासना नहीं — यह किसी भी विषय की अत्यधिक, अनियंत्रित इच्छा है। धन की इच्छा, पद की इच्छा, प्रसिद्धि की इच्छा — जब ये अनियंत्रित हो जाएँ तो "काम" बन जाती हैं।

2. क्रोध (Anger)

गीता 2.63 के अनुसार — "कामात्क्रोधोऽभिजायते" — अपूर्ण इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है। जब हम चाहते हैं कि कुछ हो और वह नहीं होता — तो क्रोध आता है। क्रोध विवेक नष्ट करता है, संबंध तोड़ता है और मन को अस्थिर बनाता है।

3. लोभ (Greed)

लोभ अर्थात "और चाहिए, और चाहिए" की अतृप्त इच्छा। जो मिला है उससे कभी संतुष्टि नहीं — यह मन को सदा अशांत रखता है। गीता 16.21 इसे "आत्मनाश का द्वार" कहती है।

उपाय: इन तीनों से लड़ने के लिए गीता विवेक (बुद्धि), वैराग्य और सत्संग की सलाह देती है। कृष्ण के उपदेशों में काम-क्रोध-लोभ पर विजय को सबसे महत्वपूर्ण साधना बताया गया है।

आधुनिक जीवन में मन पर विजय — 7 व्यावहारिक उपाय

गीता के सिद्धांतों को आज के जीवन में इस प्रकार लागू करें:

  1. प्रतिदिन ध्यान करें

    गीता अध्याय 6 के अनुसार प्रतिदिन 15-20 मिनट ध्यान करें। शुरू में 5 मिनट से शुरू करें। श्वास पर ध्यान दें या किसी मंत्र का जप करें। मन भटके तो निराश न हों — धीरे-धीरे वापस लाएँ (6.26)।

  2. सात्विक आहार अपनाएँ

    गीता 17.8-10 में तीन प्रकार के आहार बताए गए हैं। सात्विक आहार (फल, सब्जियाँ, अनाज, दूध) मन को शांत और बुद्धि को तीव्र बनाता है। राजसिक (अत्यधिक मसालेदार) और तामसिक (बासा, प्रसंस्कृत) भोजन मन को अस्थिर बनाता है।

  3. संतुलित जीवनशैली

    "नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति" (6.16) — न अति भोजन, न अति उपवास; न अति निद्रा, न अति जागरण। पर्याप्त नींद (7-8 घंटे), नियमित व्यायाम और संतुलित दिनचर्या मन की स्थिरता के लिए आवश्यक हैं।

  4. डिजिटल वैराग्य

    सोशल मीडिया, news और unnecessary notifications — ये आधुनिक युग के "विषय" हैं जो मन को चंचल बनाते हैं। दिन में निश्चित समय ही फ़ोन देखें। सोने से 1 घंटे पहले स्क्रीन बंद करें।

  5. गीता पाठ और स्वाध्याय

    प्रतिदिन एक श्लोक पढ़ें और उस पर चिंतन करें। गीता पाठ मन को शुद्ध और एकाग्र बनाता है। Srimad Gita App में प्रतिदिन एक श्लोक की सुविधा उपलब्ध है।

  6. सत्संग — अच्छे लोगों की संगति

    संगति का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सकारात्मक, ज्ञानी और शांत व्यक्तियों की संगति मन को स्वतः शांत करती है। गीता 10.9 — "मेरे भक्त आपस में मेरी चर्चा करते हैं और संतुष्ट रहते हैं।"

  7. कर्तव्य पालन — निष्काम कर्म

    खाली मन शैतान का घर। जब व्यक्ति अपने कर्तव्य में व्यस्त होता है, तो मन को भटकने का अवसर नहीं मिलता। कर्मयोग — निष्काम भाव से कर्म करना — मन को स्थिर रखने का सबसे व्यावहारिक उपाय है।

स्थितप्रज्ञ — मन पर विजय प्राप्त व्यक्ति

गीता के दूसरे अध्याय (2.55-72) में अर्जुन पूछता है — "जिसने मन पर विजय पा ली है, वह कैसा होता है?" श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) के लक्षण बताते हैं:

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
— भगवद्गीता 2.69
जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है। जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह मुनि की दृष्टि में रात है।

इस गूढ़ श्लोक का अर्थ है — जो बाहरी सुख-विलास सामान्य लोगों को आकर्षित करता है, उसमें स्थितप्रज्ञ की कोई रुचि नहीं। और जो आंतरिक आत्मिक आनंद स्थितप्रज्ञ अनुभव करता है, वह सामान्य लोगों की पहुँच से बाहर है। यह मन पर पूर्ण विजय की अवस्था है।

मन की शांति के लिए गीता पढ़ें

Srimad Gita App में प्रतिदिन एक श्लोक, ध्यान मार्गदर्शन और हिन्दी व्याख्या। मन को वश में करने की यात्रा शुरू करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता के अनुसार मन को वश में कैसे करें?

गीता 6.35 — अभ्यास (नियमित प्रयास) और वैराग्य (विषयों से विरक्ति) से। ध्यान, प्राणायाम, संतुलित जीवनशैली और सात्विक आहार भी सहायक हैं।

गीता में मन को क्या कहा गया है?

गीता 6.34 — मन चंचल, प्रमथन करने वाला, बलवान और हठी है। 6.5 — मन ही मित्र है और मन ही शत्रु। जो इसे जीतता है, उसका मन मित्र बन जाता है।

मन की चंचलता का कारण क्या है?

तीन कारण: (1) इन्द्रियों की विषयों में आसक्ति (2.62-63), (2) काम, क्रोध, लोभ (16.21), (3) रजोगुण-तमोगुण का प्रभाव (14.7-9)।

इन्द्रियों को कैसे नियंत्रित करें?

गीता 2.58 — कछुए की तरह इन्द्रियों को विषयों से समेटो। 2.59 — इन्द्रियों को दबाने से नहीं, उच्चतर विषयों (ईश्वर) में लगाने से नियंत्रण होता है।

क्या आधुनिक जीवन में मन को वश में करना संभव है?

हाँ। प्रतिदिन 15-20 मिनट ध्यान, सोशल मीडिया सीमित करें, सात्विक आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद — ये गीता के अभ्यास-वैराग्य के आधुनिक रूप हैं।