भगवद्गीता में ध्यान — ध्यानयोग की सम्पूर्ण विधि
अध्याय 6 की शिक्षा — आसन, प्राणायाम, एकाग्रता और मन को वश में करने की विधि श्रीकृष्ण के उपदेश से
संक्षिप्त उत्तर
भगवद्गीता के छठे अध्याय (ध्यानयोग / आत्मसंयमयोग) में श्रीकृष्ण ने ध्यान की विस्तृत विधि बताई है: शुद्ध एकांत स्थान पर, कुश और वस्त्र का आसन बिछाकर, मेरुदंड सीधा रखकर, इन्द्रियों को संयमित कर, मन को एकाग्र करें। अभ्यास और वैराग्य (6.35) से मन को वश में किया जा सकता है। ध्यान से आत्म-साक्षात्कार, परम शांति और दुखों से मुक्ति मिलती है।
गीता में ध्यान का परिचय — ध्यानयोग क्या है?
भगवद्गीता का छठा अध्याय पूर्णतः ध्यानयोग (Dhyana Yoga) को समर्पित है। इसे "आत्मसंयमयोग" भी कहते हैं क्योंकि इसमें मन और इन्द्रियों के संयम द्वारा आत्मा का साक्षात्कार सिखाया गया है। इस अध्याय में 47 श्लोक हैं जो ध्यान के सिद्धांत, विधि, बाधाओं और लाभों — सभी पहलुओं को स्पष्ट करते हैं।
श्रीकृष्ण ध्यान की शिक्षा तीन चरणों में देते हैं:
- बाह्य तैयारी (6.10-6.14) — स्थान, आसन और शारीरिक स्थिति
- आंतरिक प्रक्रिया (6.18-6.26) — मन की एकाग्रता और चंचलता पर नियंत्रण
- फल प्राप्ति (6.27-6.32) — आत्म-साक्षात्कार और परम सुख
ध्यान केवल बैठकर आँखें बंद करना नहीं है — यह चेतना की एक उन्नत अवस्था है जिसमें मन बाहरी विषयों से हटकर आत्मा में स्थिर हो जाता है। पतंजलि के योगसूत्र में इसे "चित्तवृत्तिनिरोधः" कहा गया है, और गीता में श्रीकृष्ण इसी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाते हैं।
ध्यान की विधि — श्रीकृष्ण के निर्देश
1. स्थान और आसन (6.11-6.13)
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
— भगवद्गीता 6.11
शुद्ध स्थान पर, न अति ऊँचा न अति नीचा, कुश, मृगछाला और वस्त्र का आसन बिछाकर स्थिर आसन लगाए।
श्रीकृष्ण ध्यान के लिए तीन बाह्य शर्तें बताते हैं:
- शुचि देश — स्वच्छ, शांत और पवित्र स्थान। आधुनिक संदर्भ में एक शांत कमरा, बगीचा या कोई एकांत स्थल।
- स्थिर आसन — न अधिक ऊँचा (अहंकार), न अधिक नीचा (आलस्य)। आज पद्मासन, सुखासन या कुर्सी पर सीधे बैठकर भी ध्यान किया जा सकता है।
- मेरुदंड सीधा (6.13) — "समं कायशिरोग्रीवम्" — शरीर, सिर और गर्दन को एक सीध में रखें। यह प्राण के सुचारु प्रवाह के लिए आवश्यक है।
2. दृष्टि और मन (6.13-6.14)
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥
— भगवद्गीता 6.13-6.14
दृष्टि नासिका के अग्रभाग पर स्थिर करके, इधर-उधर न देखते हुए, शांत मन, भयमुक्त और ब्रह्मचर्य में स्थित होकर, मन को संयमित कर, मुझमें चित्त लगाकर बैठे।
यहाँ श्रीकृष्ण आंतरिक तैयारी बताते हैं:
- नासिकाग्र दृष्टि — नाक की नोक पर दृष्टि रखना। इससे आँखें स्वतः अर्ध-बंद हो जाती हैं और मन शांत होता है। यह त्राटक ध्यान की एक विधि है।
- प्रशान्तात्मा — मन को शांत करना। चिंता, भय और क्रोध को त्यागना।
- मच्चित्तो — मन को ईश्वर में लगाना। यह भक्ति और ध्यान का संगम है।
3. संतुलित जीवनशैली (6.16-6.17)
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
— भगवद्गीता 6.16
हे अर्जुन! जो अति भोजन करता है या अति उपवास करता है, जो अति सोता है या अति जागता है — उसके लिए योग (ध्यान) सिद्ध नहीं होता।
यह गीता की अत्यंत व्यावहारिक शिक्षा है। ध्यान कोई चरम साधना नहीं है — यह संतुलित जीवनशैली माँगता है। श्रीकृष्ण कहते हैं:
- आहार में संतुलन — न अधिक खाओ, न भूखे रहो। सात्विक भोजन ध्यान में सहायक है।
- निद्रा में संतुलन — पर्याप्त नींद लो, लेकिन अति निद्रा आलस्य लाती है। 6-8 घंटे की नींद पर्याप्त है।
- कार्य में संतुलन — अपने कर्तव्य करो लेकिन अति व्यस्तता से बचो।
यह शिक्षा बुद्ध के मध्यम मार्ग से बहुत मिलती है — और गीता बुद्ध से पहले की है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इसी संतुलन की अनुशंसा करता है।
मन की चंचलता — अर्जुन का प्रश्न, कृष्ण का उत्तर
ध्यान की शिक्षा सुनकर अर्जुन वही प्रश्न पूछता है जो हर साधक के मन में आता है:
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
— भगवद्गीता 6.34
हे कृष्ण! मन बड़ा चंचल, मथने वाला, बलवान और दृढ़ है। मैं इसे वश में करना वायु को रोकने जैसा कठिन मानता हूँ।
अर्जुन मन की चार विशेषताएँ बताता है — (1) चंचल — एक स्थान पर नहीं टिकता, (2) प्रमाथि — विचलित करने वाला, (3) बलवत् — बलशाली, (4) दृढ़ — हठी। यह वर्णन आज भी उतना ही सत्य है। ध्यान में बैठते ही मन सैकड़ों विचारों में भटकने लगता है।
श्रीकृष्ण का उत्तर आश्वस्त करने वाला है:
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
— भगवद्गीता 6.35
हे महाबाहो! निस्संदेह मन चंचल और वश में करना कठिन है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है।
श्रीकृष्ण दो उपाय बताते हैं:
- अभ्यास (Practice) — बार-बार, नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करना। पहले 5 मिनट से शुरू करें, फिर धीरे-धीरे बढ़ाएँ। निरंतरता ही सफलता की कुंजी है।
- वैराग्य (Detachment) — विषयों से मन की आसक्ति कम करना। इसका अर्थ संसार त्यागना नहीं, बल्कि विषयों पर निर्भरता कम करना है। जब मन की इच्छाएँ कम होती हैं, तो ध्यान स्वतः गहरा होता है।
आधुनिक न्यूरोसाइंस भी इसकी पुष्टि करता है — नियमित ध्यान (meditation) से मस्तिष्क की संरचना बदलती है, prefrontal cortex मजबूत होता है और मन की एकाग्रता बढ़ती है। गीता ने 5000 वर्ष पहले वही बताया जो आज विज्ञान सिद्ध कर रहा है।
अर्जुन का एक और प्रश्न था — "जो व्यक्ति ध्यान शुरू करता है लेकिन सफल नहीं होता, उसका क्या होता है?" (6.37-38)। श्रीकृष्ण का उत्तर है — "कोई भी शुभ प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता" (6.40)। अगले जन्म में वह व्यक्ति वहीं से आगे बढ़ता है जहाँ उसने छोड़ा था। यह ध्यान के प्रति मन को वश में करने का अभ्यास जारी रखने की प्रेरणा देता है।
ध्यान के लाभ — गीता के अनुसार
श्रीकृष्ण ध्यान के जो लाभ बताते हैं, वे केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी हैं:
1. आत्म-साक्षात्कार (6.20)
"यत्रोपरमते चित्तं" — जब मन शांत होकर ठहर जाता है, तब व्यक्ति शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है। यह ध्यान का सर्वोच्च फल है — अपने सच्चे स्वरूप को जानना।
2. परम सुख (6.21)
"सुखमात्यन्तिकं" — ध्यान में वह अनंत सुख मिलता है जो इन्द्रियों से परे है। यह सुख बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है, इसलिए यह शाश्वत और अक्षय है। जो व्यक्ति एक बार इस आंतरिक सुख का अनुभव कर लेता है, उसे बाहरी विषय आकर्षित नहीं करते।
3. दुखों से मुक्ति (6.23)
"तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्" — इस योग (ध्यान) को जानो जो दुखों के संयोग से वियोग कराता है। ध्यान के नियमित अभ्यास से मन की अशांति, चिंता और भय धीरे-धीरे समाप्त होते हैं।
4. समदर्शन (6.29)
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
— भगवद्गीता 6.29
योग में स्थित आत्मा वाला व्यक्ति सभी प्राणियों में आत्मा को और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है — सर्वत्र समान दृष्टि रखता है।
ध्यान का सबसे गहरा लाभ है समदर्शन — सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना। जब व्यक्ति ध्यान में अपनी आत्मा का अनुभव करता है, तो उसे अनुभव होता है कि वही आत्मा सबमें है। यह भेदभाव, द्वेष और ईर्ष्या का अंत करता है।
5. स्थिरता और दृढ़ता (6.22)
ध्यान से मन में ऐसी स्थिरता आती है कि बड़े से बड़े दुख में भी व्यक्ति विचलित नहीं होता। यह श्लोक 2.48 के "समत्वं योग उच्यते" का व्यावहारिक अनुभव है।
गीता का ध्यान और आधुनिक Meditation — तुलना
आज विश्वभर में mindfulness meditation बहुत लोकप्रिय है। गीता का ध्यानयोग इससे कई मायनों में समान और कुछ मायनों में भिन्न है:
समानताएँ
- एकाग्रता: दोनों में मन को एक बिंदु पर केंद्रित करने पर बल।
- नियमित अभ्यास: गीता कहती है "अभ्यासेन गृह्यते" — आधुनिक शोध भी daily practice की अनुशंसा करता है।
- संतुलित जीवन: गीता का "न अत्यश्नतः" — आधुनिक wellness का balanced lifestyle।
- तनाव मुक्ति: दोनों का प्रमुख लाभ मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति है।
गीता की विशिष्टता
- ईश्वर-केंद्रित: गीता का ध्यान केवल शांति के लिए नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और ईश्वर-प्राप्ति के लिए है।
- कर्मयोग से जुड़ाव: गीता ध्यान को कर्म से अलग नहीं करती। कर्मयोग और ध्यानयोग साथ-साथ चलते हैं।
- शरणागति: ध्यान का अंतिम लक्ष्य भक्तियोग — ईश्वर को समर्पण है (6.47)।
ध्यान शुरू करने के लिए सरल चरण
यदि आप ध्यान की शुरुआत करना चाहते हैं, तो गीता के आधार पर ये 5 सरल चरण अपनाएँ:
- स्थान चुनें: एक शांत, स्वच्छ कमरे का कोना। प्रतिदिन वही स्थान प्रयोग करें।
- समय निश्चित करें: प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) सर्वोत्तम है। शुरू में 10-15 मिनट पर्याप्त है।
- आसन लगाएँ: सुखासन या पद्मासन में बैठें। रीढ़ की हड्डी सीधी रखें।
- श्वास पर ध्यान: आँखें बंद कर प्राकृतिक श्वास पर ध्यान दें। गिनती करें — श्वास अंदर (1), बाहर (2)।
- मन भटके तो: धीरे-धीरे वापस श्वास पर लाएँ (6.26)। निराश न हों — यही अभ्यास है।
गीता में ध्यान के अन्य संदर्भ
छठे अध्याय के अलावा, गीता में ध्यान के संदर्भ अनेक स्थानों पर मिलते हैं:
- अध्याय 2 (सांख्ययोग): स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) का वर्णन — ध्यान का फल।
- अध्याय 5 (कर्मसंन्यासयोग): "स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्" (5.27) — बाहरी विषयों को बाहर रखकर, दृष्टि भौंहों के मध्य स्थिर कर, प्राणायाम करें।
- अध्याय 8 (अक्षरब्रह्मयोग): "ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" (8.13) — ॐ का जप करते हुए ध्यान करने की विधि।
- अध्याय 12 (भक्तियोग): यदि ध्यान कठिन लगे, तो भक्ति का मार्ग अपनाएँ (12.8-12)।
- अध्याय 13 (क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोग): "ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति" (13.25) — ध्यान, ज्ञान और कर्म — ईश्वर प्राप्ति के तीन मार्ग।
ध्यान के श्रेष्ठ योगी — गीता 6.47
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥
— भगवद्गीता 6.47
सभी योगियों में जो श्रद्धापूर्वक मुझमें अंतरात्मा लगाकर मेरा भजन करता है, वह मेरी दृष्टि में सबसे श्रेष्ठ योगी है।
छठे अध्याय का यह अंतिम श्लोक गीता के ध्यानयोग का सर्वोच्च निष्कर्ष है — ध्यान का श्रेष्ठतम रूप भगवान में मन लगाना है। यह भक्तियोग और ध्यानयोग का मिलन बिंदु है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भगवद्गीता में ध्यान की क्या विधि बताई गई है?
गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण ने विस्तृत विधि बताई: शुद्ध स्थान पर आसन बिछाकर, मेरुदंड सीधा रखकर, दृष्टि नासिका पर स्थिर कर, मन एकाग्र करें। आहार और निद्रा में संतुलन रखें (6.16)। ध्यान में मन भटके तो धीरे-धीरे वापस लाएँ (6.26)।
ध्यान में मन भटकने पर क्या करें?
गीता 6.26 के अनुसार — "यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्" — मन जब भी भटके, धीरे से वापस लाओ। निराश न हों, यही अभ्यास है। श्रीकृष्ण कहते हैं अभ्यास और वैराग्य से मन वश में आता है (6.35)।
गीता में ध्यान के क्या लाभ बताए गए हैं?
आत्म-साक्षात्कार (6.20), परम सुख (6.21), दुखों से मुक्ति (6.23), समदर्शन — सभी प्राणियों में आत्मा देखना (6.29), और मानसिक स्थिरता। ध्यान से व्यक्ति बड़े से बड़े दुख में भी विचलित नहीं होता।
क्या गृहस्थ जीवन में ध्यान संभव है?
गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं (6.1) — ध्यान के लिए संन्यास आवश्यक नहीं। जो अपने कर्तव्य करते हुए नियमित ध्यान करता है, वही सच्चा योगी है। प्रतिदिन 15-30 मिनट का ध्यान भी परिवर्तनकारी होता है।
ध्यान और भक्ति में क्या संबंध है?
गीता 6.47 में श्रीकृष्ण कहते हैं — सबसे श्रेष्ठ योगी वह है जो श्रद्धापूर्वक भगवान में मन लगाता है। अर्थात ध्यान का सर्वोच्च रूप भक्ति है। ध्यान में मन शांत होता है, भक्ति में मन ईश्वर से जुड़ता है — दोनों पूरक हैं।