भगवद्गीता के 18 अध्यायों का सार

प्रत्येक अध्याय का नाम, श्लोक संख्या, विषय और मूल शिक्षा — अर्जुनविषादयोग से मोक्षसंन्यासयोग तक

संक्षिप्त उत्तर

भगवद्गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इन्हें तीन खंडों में बाँटा जाता है: कर्मषट्क (अध्याय 1-6) — कर्मयोग और आत्मज्ञान; भक्तिषट्क (अध्याय 7-12) — ईश्वर ज्ञान और भक्ति; ज्ञानषट्क (अध्याय 13-18) — प्रकृति-पुरुष विवेक और मोक्ष। नीचे प्रत्येक अध्याय का विस्तृत सार दिया गया है।

कर्मषट्क — अध्याय 1 से 6 (कर्मयोग)

अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग

47 श्लोक | विषय: अर्जुन का शोक और विषाद

कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान पर अर्जुन अपने बंधु-बांधवों, गुरुओं और संबंधियों को सामने देखकर शोक और मोह से व्याकुल हो जाता है। वह गांडीव धनुष छोड़कर रथ में बैठ जाता है और कहता है — "मैं युद्ध नहीं करूँगा।" यह अध्याय समस्या प्रस्तुत करता है जिसका समाधान शेष 17 अध्यायों में मिलता है।

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अध्याय 2 — सांख्ययोग

72 श्लोक | विषय: आत्मज्ञान, निष्काम कर्म, स्थितप्रज्ञ

गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय जिसमें सम्पूर्ण गीता का सार है। श्रीकृष्ण आत्मा की अमरता (2.20), निष्काम कर्म (2.47), समत्व योग (2.48) और स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) के लक्षण (2.55-72) बताते हैं। यह गीता पढ़ने की शुरुआत के लिए सर्वोत्तम अध्याय है।

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अध्याय 3 — कर्मयोग

43 श्लोक | विषय: कर्म का स्वरूप, स्वधर्म, लोकसंग्रह

कर्मयोग की विस्तृत शिक्षा। कर्म त्यागना असंभव है (3.5)। नियत कर्म करो (3.8)। स्वधर्म का पालन करो (3.35)। काम और क्रोध सबसे बड़े शत्रु हैं (3.37)। समाज कल्याण (लोकसंग्रह) के लिए कर्म करो (3.25)।

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अध्याय 4 — ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

42 श्लोक | विषय: अवतार सिद्धांत, ज्ञान से मुक्ति

अवतार सिद्धांत (4.7-8) — जब-जब धर्म की हानि होती है, भगवान अवतार लेते हैं। कर्म-अकर्म-विकर्म का भेद (4.17-18)। ज्ञानाग्नि सब कर्मों को भस्म करती है (4.37)। श्रद्धावान को ज्ञान प्राप्त होता है (4.39)।

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अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग

29 श्लोक | विषय: कर्म और संन्यास की तुलना

कर्मयोग और संन्यासयोग — दोनों मुक्ति देते हैं, लेकिन कर्मयोग श्रेष्ठ है (5.2)। ज्ञानी कर्म करते हुए भी कहता है "मैं कुछ नहीं करता" (5.8-9)। सच्चा संन्यास कर्म त्यागना नहीं, बल्कि कर्मफल त्यागना है।

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अध्याय 6 — ध्यानयोग (आत्मसंयमयोग)

47 श्लोक | विषय: ध्यान की विधि, मन नियंत्रण

ध्यान की विस्तृत विधि — आसन, स्थान, आहार (6.11-17)। मन चंचल है लेकिन अभ्यास और वैराग्य से वश में आता है (6.35)। ध्यान से परम सुख मिलता है (6.21)। सबसे श्रेष्ठ योगी वह है जो भगवान में मन लगाता है (6.47)।

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भक्तिषट्क — अध्याय 7 से 12 (भक्तियोग)

अध्याय 7 — ज्ञानविज्ञानयोग

30 श्लोक | विषय: ईश्वर का ज्ञान, अपरा-परा प्रकृति

भगवान की दो प्रकृतियाँ — अपरा (भौतिक जगत) और परा (जीवात्मा)। चार प्रकार के भक्त — आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी (7.16)। ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है (7.17)। माया से मोहित लोग भगवान को नहीं जान पाते (7.15)।

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अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग

28 श्लोक | विषय: ब्रह्म, अध्यात्म, मृत्यु काल का स्मरण

अंतकाल (मृत्यु समय) में जिसका स्मरण करते हैं, उसी को प्राप्त होते हैं (8.6)। ॐ का जप करते हुए ध्यान करें (8.13)। भगवान को प्राप्त करके पुनर्जन्म नहीं होता (8.15-16)। ब्रह्मा का एक दिन और रात्रि का वर्णन (8.17)।

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अध्याय 9 — राजविद्या राजगुह्ययोग

34 श्लोक | विषय: भक्ति की श्रेष्ठता, ईश्वर-अर्पण

गीता का "राज ज्ञान" — सबसे गोपनीय ज्ञान। भगवान सर्वव्यापी हैं (9.4-5)। भक्ति में भेदभाव नहीं — "पत्रं पुष्पं फलं तोयम्" (9.26)। सब कर्म भगवान को अर्पित करो (9.27)।

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अध्याय 10 — विभूतियोग

42 श्लोक | विषय: ईश्वर की विभूतियाँ (दिव्य गुण)

श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों (दिव्य अभिव्यक्तियों) का वर्णन करते हैं। "मैं सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ" (10.8)। आदित्यों में विष्णु, नक्षत्रों में चन्द्रमा, वेदों में सामवेद, इन्द्रियों में मन (10.21-22)। "जो भी ऐश्वर्यमय, तेजस्वी है — वह मेरे तेज का अंश है" (10.41)।

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अध्याय 11 — विश्वरूपदर्शनयोग

55 श्लोक | विषय: विश्वरूप दर्शन

गीता का सबसे रोमांचक अध्याय। कृष्ण अर्जुन को दिव्य दृष्टि देकर अपना विश्वरूप दिखाते हैं — सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक शरीर में। अर्जुन भयभीत और विस्मित होता है (11.14-20)। "काल हूँ मैं, लोकों का विनाशक" (11.32)।

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अध्याय 12 — भक्तियोग

20 श्लोक | विषय: भक्ति का सर्वश्रेष्ठ मार्ग, भक्त के लक्षण

गीता का सबसे छोटा और सबसे मधुर अध्याय। सगुण भक्ति श्रेष्ठ है (12.2)। यदि ध्यान कठिन लगे तो कर्मयोग अपनाओ (12.10-11)। भक्त के 12 गुण — द्वेषरहित, दयालु, ममतारहित, समदुखसुखी, क्षमाशील (12.13-20)।

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ज्ञानषट्क — अध्याय 13 से 18 (ज्ञानयोग)

अध्याय 13 — क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

35 श्लोक | विषय: शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ)

शरीर "क्षेत्र" है और आत्मा "क्षेत्रज्ञ" है (13.1-2)। ज्ञान के 20 लक्षण — विनम्रता, अहिंसा, क्षमा, सरलता आदि (13.8-12)। ध्यान, सांख्य या कर्मयोग — ईश्वर प्राप्ति के अनेक मार्ग (13.25)।

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अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग

27 श्लोक | विषय: सत्व, रजस, तमस — तीन गुण

प्रकृति के तीन गुण: सत्वगुण (ज्ञान, प्रकाश), रजोगुण (कर्म, आसक्ति), तमोगुण (आलस्य, मोह)। हर मनुष्य इन तीनों गुणों के मिश्रण से बंधा है (14.5-8)। जो तीनों गुणों से ऊपर उठता है — वही गुणातीत है और मोक्ष प्राप्त करता है (14.26)।

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अध्याय 15 — पुरुषोत्तमयोग

20 श्लोक | विषय: संसार वृक्ष, पुरुषोत्तम (परमात्मा)

संसार एक अश्वत्थ वृक्ष है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं (15.1)। तीन पुरुष — क्षर (शरीर), अक्षर (आत्मा), पुरुषोत्तम (परमात्मा)। "मैं क्षर से परे और अक्षर से भी उत्तम हूँ — इसलिए पुरुषोत्तम कहलाता हूँ" (15.18)। शंकराचार्य ने इस छोटे अध्याय को गीता का सार कहा।

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अध्याय 16 — दैवासुरसम्पद्विभागयोग

24 श्लोक | विषय: दैवी और आसुरी संपदा

दैवी गुण (16.1-3): निर्भयता, सत्य, अहिंसा, क्षमा, तेज, दान। आसुरी गुण (16.4): दम्भ, अभिमान, क्रोध, कठोरता, अज्ञान। काम, क्रोध, लोभ — तीन नरक के द्वार (16.21)। दैवी संपदा मोक्ष देती है, आसुरी संपदा बंधन देती है (16.5)।

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अध्याय 17 — श्रद्धात्रयविभागयोग

28 श्लोक | विषय: श्रद्धा, आहार, तप, दान के तीन प्रकार

तीन प्रकार की श्रद्धा — सात्विक, राजसिक, तामसिक (17.2-4)। आहार, यज्ञ, तप और दान — सब के तीन-तीन प्रकार बताए गए हैं। "ॐ तत् सत्" — ब्रह्म के तीन नाम (17.23)। बिना श्रद्धा के किया गया कार्य "असत्" कहलाता है (17.28)।

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अध्याय 18 — मोक्षसंन्यासयोग

78 श्लोक | विषय: त्याग, कर्म-ज्ञान-भक्ति का निष्कर्ष, शरणागति

गीता का अंतिम और सबसे विस्तृत अध्याय। संन्यास और त्याग का अंतर (18.2)। कर्म, कर्ता, ज्ञान, बुद्धि — सबके तीन प्रकार (18.19-40)। स्वधर्म का पालन (18.47)। चरमश्लोक: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (18.66) — मेरी शरण में आ जाओ। अर्जुन का मोह नष्ट होता है (18.73)।

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गीता के 18 अध्यायों का सारांश — एक दृष्टि में

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
— भगवद्गीता 18.78 (अंतिम श्लोक)
जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन है, वहाँ श्री, विजय, विभूति और अटल नीति निश्चित है।

यह गीता का अंतिम श्लोक है जो संजय बोलता है। इसमें गीता का सम्पूर्ण संदेश समाहित है — जहाँ ईश्वर (कृष्ण) का ज्ञान है और मनुष्य (अर्जुन) का पुरुषार्थ है, वहाँ सफलता निश्चित है।

गीता की 18 अध्यायों की यात्रा शोक से शांति तक है: अध्याय 1 में अर्जुन का विषाद, अध्याय 18 में अर्जुन का मोह नष्ट होना — "करिष्ये वचनं तव" (18.73) — "मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।" यही गीता की सफलता है — एक भ्रमित व्यक्ति को स्पष्ट दृष्टि और कर्तव्य बोध प्राप्त होना।

सभी 18 अध्याय हिन्दी में पढ़ें

Srimad Gita App में प्रत्येक अध्याय का विस्तृत हिन्दी अनुवाद, श्लोक-दर-श्लोक व्याख्या और ऑडियो उपलब्ध है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भगवद्गीता में कुल कितने अध्याय हैं?

18 अध्याय और 700 श्लोक। तीन खंड: कर्मषट्क (1-6), भक्तिषट्क (7-12), ज्ञानषट्क (13-18)।

गीता का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय कौन सा है?

अध्याय 2 (सांख्ययोग) सम्पूर्ण गीता का सारांश है। अध्याय 15 (पुरुषोत्तमयोग) को शंकराचार्य ने गीता का सार कहा। अध्याय 18 अंतिम निष्कर्ष है।

गीता पढ़ने की शुरुआत किस अध्याय से करें?

अध्याय 2 से शुरू करें (सभी शिक्षाओं का सारांश)। फिर 3 (कर्मयोग), 12 (भक्तियोग), 18 (निष्कर्ष)। इसके बाद क्रम से पूरी गीता पढ़ें।

गीता के तीन खंड कौन से हैं?

कर्मषट्क (1-6): कर्म, आत्मज्ञान, ध्यान। भक्तिषट्क (7-12): ईश्वर ज्ञान, विश्वरूप, भक्ति। ज्ञानषट्क (13-18): प्रकृति-पुरुष, त्रिगुण, श्रद्धा, मोक्ष।

प्रत्येक अध्याय में कितने श्लोक हैं?

अ.1: 47, अ.2: 72, अ.3: 43, अ.4: 42, अ.5: 29, अ.6: 47, अ.7: 30, अ.8: 28, अ.9: 34, अ.10: 42, अ.11: 55, अ.12: 20, अ.13: 35, अ.14: 27, अ.15: 20, अ.16: 24, अ.17: 28, अ.18: 78। कुल: 700।