कर्म, अकर्म, विकर्म का भेद — कर्मफल सिद्धांत, संचित-प्रारब्ध-क्रियमाण कर्म और कर्मबंधन से मुक्ति
गीता में कर्म का अर्थ केवल "काम करना" नहीं है। कर्म शरीर, मन और वाणी से किया गया प्रत्येक कार्य है जिसका फल अवश्य मिलता है। गीता तीन प्रकार के कर्म बताती है — कर्म (नियत कर्तव्य), अकर्म (कर्म में अकर्म — कर्ता भाव का अभाव), और विकर्म (निषिद्ध कार्य)। गीता कर्म त्यागने की नहीं, बल्कि निष्काम कर्म — फल की आसक्ति त्यागकर कर्तव्य पालन की शिक्षा देती है।
"कर्म" शब्द संस्कृत धातु "कृ" (करना) से बना है। शाब्दिक रूप में इसका अर्थ है "कार्य" या "क्रिया"। लेकिन भगवद्गीता में कर्म का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है।
गीता के अनुसार कर्म तीन स्तरों पर होता है:
गीता की सबसे क्रांतिकारी शिक्षा यह है कि मानसिक कर्म भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक कर्म। यदि कोई मन में बुरा सोचता है लेकिन बाहर से अच्छा दिखाता है, तो भी उसका कर्मफल बनता है। श्रीकृष्ण कहते हैं (3.6) — जो इन्द्रियों को रोककर मन में विषयों का चिंतन करता है, वह मिथ्याचारी है।
यह श्लोक बताता है कि कर्म को समझना सरल नहीं है — इसीलिए श्रीकृष्ण ने इस पर विस्तार से शिक्षा दी। तीसरे अध्याय (कर्मयोग) और चौथे अध्याय (ज्ञानकर्मसंन्यासयोग) में कर्म का सबसे विस्तृत विवेचन है।
कर्म वह कार्य है जो शास्त्र और धर्म के अनुसार करना उचित है। यह मनुष्य का स्वधर्म है — उसकी प्रकृति, योग्यता और परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य। एक शिक्षक का कर्म पढ़ाना है, एक चिकित्सक का कर्म रोगियों की सेवा करना है, एक सैनिक का कर्म देश की रक्षा करना है।
गीता 3.8 में श्रीकृष्ण कहते हैं — "नियतं कुरु कर्म त्वम्" — अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म करना अकर्म (कर्म न करना) से श्रेष्ठ है।
यह गीता के सबसे गहन श्लोकों में से एक है। "कर्म में अकर्म" का अर्थ है — कर्म करते हुए भी कर्ता भाव से मुक्त रहना। जब व्यक्ति कर्म को ईश्वर-अर्पण मानकर करता है, तो वह कर्म करते हुए भी बंधन से मुक्त रहता है — यही "कर्म में अकर्म" है।
"अकर्म में कर्म" का अर्थ है — बाहर से कुछ न करते हुए भी यदि मन में विषयों का चिंतन चल रहा है, तो वह भी कर्म ही है। इसलिए केवल शारीरिक रूप से निष्क्रिय होना अकर्म नहीं है।
विकर्म वह कार्य है जो धर्म-विरुद्ध है, जो हानिकारक है, जो शास्त्रों में निषिद्ध है। चोरी, हिंसा, झूठ, धोखा — ये सब विकर्म हैं। गीता 16.7-16.21 में आसुरी संपदा के वर्णन में विकर्म के उदाहरण दिए गए हैं: काम, क्रोध, लोभ — ये तीन नरक के द्वार हैं (16.21)।
| प्रकार | परिभाषा | उदाहरण | फल |
|---|---|---|---|
| कर्म | नियत कर्तव्य | शिक्षक का पढ़ाना, माता का पालन-पोषण | पुण्य |
| अकर्म | कर्म में कर्ता भाव का अभाव | निष्काम भाव से सेवा करना | बंधन से मुक्ति |
| विकर्म | निषिद्ध कार्य | चोरी, हिंसा, धोखा | पाप |
गीता का कर्मफल सिद्धांत भारतीय दर्शन का सबसे मौलिक सिद्धांत है। इसके अनुसार प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है — कोई कर्म बिना फल के नहीं जाता। न्यूटन का तीसरा नियम "हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है" — कर्मफल सिद्धांत इसका आध्यात्मिक रूप है।
गीता की शिक्षा है कि प्रारब्ध को स्वीकार करो (जो हो चुका उसे बदला नहीं जा सकता) और क्रियमाण कर्म को सुधारो (वर्तमान में अच्छे कर्म करो)। यही "कर्मण्येवाधिकारस्ते" (2.47) का सार है — तुम केवल वर्तमान कर्म पर नियंत्रण रखो।
गीता के अठारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण कर्म को तीन गुणों के आधार पर वर्गीकृत करते हैं:
यह गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है। कर्मबंधन से मुक्ति का पहला उपाय है — कर्म करो लेकिन फल की चिंता मत करो। जब कर्म निष्काम भाव से किया जाता है, तो वह बंधन नहीं बनता। कर्मयोग का यही सार है।
कर्मबंधन से मुक्ति का दूसरा उपाय है — प्रत्येक कर्म को ईश्वर को अर्पित करना। जब व्यक्ति खाना खाते समय भी सोचता है "यह ईश्वर का प्रसाद है", काम करते समय सोचता है "यह ईश्वर की सेवा है" — तो कर्म पूजा बन जाता है और बंधन नहीं बनता।
तीसरा उपाय है ज्ञान। गीता 4.37 में श्रीकृष्ण कहते हैं — "ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते" — ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है। जब व्यक्ति जान लेता है कि "मैं आत्मा हूँ, शरीर नहीं", तो कर्मबंधन स्वतः समाप्त हो जाता है।
आदि शंकराचार्य ने इस ज्ञान-मार्ग को सर्वोच्च बताया, जबकि रामानुजाचार्य ने भक्ति के साथ ज्ञान के संयोग को सर्वश्रेष्ठ माना।
गीता का कर्म सिद्धांत आज के जीवन में अत्यंत प्रासंगिक है:
गीता की शिक्षा है — अपना काम पूरी लगन से करो, लेकिन promotion, salary hike या recognition की चिंता में मत डूबो। जो व्यक्ति कर्तव्य भाव से काम करता है, उसे स्वाभाविक रूप से सफलता मिलती है। लोकमान्य तिलक ने अपनी पुस्तक गीतारहस्य में इसी कर्मयोग की विस्तृत व्याख्या की।
माता-पिता का कर्म संतान का पालन-पोषण है — यह निष्काम कर्म का सबसे सुंदर उदाहरण है। माँ अपने बच्चे की सेवा किसी प्रतिफल की अपेक्षा से नहीं, बल्कि स्वाभाविक प्रेम से करती है। गीता 3.25 में श्रीकृष्ण कहते हैं — जैसे अज्ञानी कर्मफल की आसक्ति से कर्म करता है, वैसे ही ज्ञानी लोकसंग्रह (समाज कल्याण) के लिए कर्म करे।
महात्मा गांधी ने गीता के कर्म सिद्धांत से प्रेरित होकर निष्काम सेवा का मार्ग अपनाया। उन्होंने कहा — "गीता मेरी माँ है; जब मैं कठिनाई में होता हूँ, तो गीता मुझे सहारा देती है।" गांधी जी का अनासक्तियोग गीता के कर्म सिद्धांत की आधुनिक व्याख्या है।
आधुनिक मनोविज्ञान में Cognitive Behavioral Therapy (CBT) का मूल सिद्धांत है — "विचार, भावनाएँ और कर्म एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।" गीता ने 5000 वर्ष पहले यही बात कही — मानसिक कर्म (विचार) शारीरिक कर्म को प्रभावित करते हैं। मन को वश में करके ही व्यक्ति अपने कर्मों को सुधार सकता है।
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गीता में कर्म का अर्थ शरीर, मन और वाणी से किया गया प्रत्येक कार्य है जिसका फल मिलता है। गीता तीन प्रकार के कर्म बताती है — कर्म (नियत कर्तव्य), अकर्म (कर्म में कर्ता भाव का अभाव), और विकर्म (निषिद्ध कार्य)। कर्म की गति गहन है (4.17)।
कर्म = नियत कर्तव्य (शिक्षक का पढ़ाना)। अकर्म = कर्म करते हुए कर्ता भाव से मुक्त रहना (4.18)। विकर्म = निषिद्ध, अधर्म कार्य (हिंसा, चोरी)। गीता "कर्म में अकर्म" की स्थिति को सर्वश्रेष्ठ मानती है।
प्रत्येक कर्म का फल अवश्य मिलता है। तीन प्रकार: संचित (पिछले जन्मों का भंडार), प्रारब्ध (इस जन्म का भोग), क्रियमाण (वर्तमान कर्म)। गीता कहती है — प्रारब्ध स्वीकार करो, क्रियमाण सुधारो।
तीन उपाय: 1) निष्काम कर्म — फल की इच्छा त्यागो (2.47), 2) ईश्वर-अर्पण — सब कर्म भगवान को समर्पित करो (9.27), 3) ज्ञान — आत्मज्ञान प्राप्त करो (4.37)। इनमें से कोई भी मार्ग कर्मबंधन से मुक्ति देता है।
बिलकुल नहीं। गीता 3.5 कहती है — कोई भी एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। कर्म से भागना असंभव है। गीता कर्म त्यागने की नहीं, फल की आसक्ति त्यागने की शिक्षा देती है।